बालश्रम और जन जागरूकता (अम्बिकापुर के विषेष संन्दभ में)
अभिषेक दूबे
संत गहिरा गुरू विष्वविद्यायल, अम्बिकापुर, सरगुजा समाजषास्त्र विभाग, छत्तीसगढ़.
*Corresponding Author E-mail:
ABSTRACT:
वैष्वीकरण के इस युग में मानव समाज की प्रगति व विकास का मुख्य आधार आर्थिक गतिविधियाँ है। आर्थिक विकास की यह सीमा मानव के षारीरिक-मानसिक क्षमता पर आधारित श्रम पर निर्भर करता है। मनुष्य स्वंय की आवष्यकता व जरुरतों को पुर्ण करने के लिए विभिन्न प्रकार के क्रियाकलापो को सम्पन्न कर अपना एवं अपने राष्ट्र के विकास मे महत्वर्पूण योगदान करता है। श्रम का यह स्वरुप मानव विकास के ऐतिहासिक कालों से निरन्तर चलता आ रहा है। जिसमे समयानुकुल विभिन्न प्रकार के परिवर्तन हुए है। वर्तमान औद्योगिक-प्रौद्योगिक युग मे निरन्तर बढ़ती जनसंख्या की अवष्यकताओं को पूर्ण करने के लिए बडे़-बडे़ उद्योग-कारखाने व तकनीक आधारित मषीनो का चलन बढ़ गया है। जिसमे विभिन्न प्रकार कौषलो व क्षमताओं से सम्पन्न श्रमिको की माँग बढ़ गयी है। जिससे श्रमिक व श्रम दोनो के मुल्य मे वृद्धि होने लगा है। जिसके कारण समाज में कुछ लोग सस्ते व समान्य श्रमिकों के रुप मे बालकों को भी कार्यो पर नियोजित करने लगें, ऐसे ही बालक जो एक निष्चित या निर्धारित आयु से पुर्व आर्थिक गतिविधियों मे नियोजित कर दियें जाते है उन्हे बाल श्रमिक के रुप मे जाना जाता है। यह बल श्रम मुख्यतः दो स्वरुपो में चिन्हित किया जाता है। प्रथम उम्र के आधार पर, द्वितिय कार्य दषाओं के आधार पर बाल श्रम। प्रस्तुत शोध पत्र अम्बिकापुर क्षेत्र मे बाल श्रमिको से सम्बन्धित क्या चुनौतियों व समस्या है तथा ऐसी चुनैातियों एवं समस्या के प्रति जन-जागरूकता की अवश्यकताओ का विश्लेषण किया गया है। जिसमे दैव निदर्शन विधि का प्रयोग किया गया है षोध सर्वेक्षण में अम्बिकापुर के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रो के 50-50 लोगों के साथ जो विभिन्न आर्थिक व्यवसायिक गतिविधियों में संलग्न हो तथा शिक्षित हो, उनके साथ प्रत्यक्ष रूप से साक्षात्कार कर अनुसूची को भरा गया है। तथा लोगों से परिचर्चा कर तथ्यों को एकत्रित किया गया है। प्रस्तुत अध्ययन मे बाल श्रामिको के प्रति लोगों में जागरूकता के साथ बाल अधिकारों एवं उनके विकास के विभिन्न आयामो के प्रति लोगो मे जागरूकता का विश्लेषण किया गया है।
KEYWORDS: बालश्रमिक, जागरुकता, सहभागिता.
प्रस्तावना &
सभी मानव चाहे वह किसी भी परिस्थिति से सम्बन्धित हो, वे अपनी आवश्यकता एवं जरूरतों को पूर्ण करने के लिए आर्थिक क्रियाकलाप अवश्य करता है और ऐसे क्रियाकलाप समाज एवं राष्ट्र के विकास के लिए अनिवार्य भी है।
परन्तु जब इन्ही आर्थिक क्रियाकलापो में बालकों को एक निश्चित उम्र से पूर्व ही किन्ही कारणवश नियोजित कर दिया जाता है तो उसे हम बाल श्रम के रूप मे जानते है। बालको को परिभाषित करते हुए न्छब्त्ब्.1989 कहता है “बालक वे है जिनकी उम्र 18 वर्ष पूर्ण नही हुयी है’’। इस प्रकार जन्म से लेकर किशोरा वस्था तक के उम्र को हम बालक या बच्चेे के रूप मे जानते है। बालकोें का यह उम्र वृद्धि एवं विकास का होता है जिसमें उनकी शारीरिक, मानसिक, सामाजिक विकास के साथ व्यक्तित्व व्यवहार, सामाजिकरण के साथ विभिन्न प्रकार के ज्ञान एवं बैद्धिक विकास कि क्रियायें सम्पन्न्न होती है परन्तु जब उन्हे विकास के पर्याप्त अवसर को न प्रदान करते हुए उन्हें अर्थिक गतिविधियों में सम्मलित कर लेते है तो उनकी वृद्धि-विकास की प्रक्रिया अवरूद्ध होती है। जिससे उनकी मानसिक एव बैद्धिक प्रगति के साथ शारीरिक विकास भी प्रभावित हो जाता है और उनके स्वस्थ विकास की प्रक्रिया को विपरित दिशा से जुड़ने पर मजबुर कर दिया जाता है। परन्तु उपरोक्त समस्याओं के अलावा भी अनेक ऐसी समस्या एवं चुनैतियॉं है। जो बाल श्रमिको को अपने दैनिक जीवन मे सामना करना पडता है जिसमें प्रमुखतः
1 सामना परिश्रमिक का अभाव
2 शारीरिक मानसिक प्रताडना
3 शरीरिक हिंसा एवं शोषण,
4 बॅधुआ मजदूरी
5 बाल तस्करी अंग तस्करी,
6 भिक्षाटन, भुखमरी
7 अशिक्षा, असमानता
8 नशाखोरी
9 अविकसित व्यक्तित्व एवं व्यवहार
10 नैतिक मुल्यों का पतन
उपरोक्त ऐसी चुनौतियॉ है जो बच्चों को अपने शारीरिक मानसिक विकास के दुष्प्रभावों के अलावा बाल श्रम के क्रियाओं के कारण उन्हे सहना पड़ता है।
इसी प्रकार की समस्या से प्रभावित छतीसगढ का जिला सरगुजा का अम्बिकापुर परिक्षेत्र है जहॉ जनजातिय समुदाय के साथ सामान्य जनसंख्या मे प्रान्त प्रवासी जनसंख्या का समिश्रण है। यह एक विकासशील शहरी ग्रामीण मिश्रित क्षेत्र है, जहॉं रोजगार एवं व्यवसाय जैसे अनेक आधुनिक साधन एवं संसाधन मौजुद है। परन्तु आर्थिक सामाजिक दृृष्टिकोण से पिछड़े होने के एवं जन-जागरुकता के अभाव के करण बाल श्रम के दुष्प्रभावो एवं बालकों के अधिकारों के प्रप्ति जागरूकता के पर्याप्त स्तर का अभाव है। और लोगों मे ऐसी समस्या के प्रति अशिक्षा एवं अज्ञानता हैै जिसके कारण बाल श्रमिकों को अपने जीवन में कष्टकारी चुनौतियों एवं समस्याओ से निजात पाना मुश्किल हो रहा है। और उनके अधिकारी के प्रति जागरूकता मे कमी के कारण उन्हे सामान्य विकास तथा मूलभूत आवश्यकताओं की पुर्ति में भी विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
शोध समस्या का चयन -
बाल श्रमिको की समस्या उनके वैयक्तिक समस्या के साथ समाज एवं राष्ट्र के विकास मे एक बडी बाधा के रूप में सामने प्रस्तुत होती है। ऐसी गैर सामाजिक क्रियाओें के कारण बालक एक ऐसे कुचक मे फँस जाते है, जिससे उन्हे अनेक कष्टकारी समस्याआंे एवं परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। अशिक्षा, निम्न आर्थिक परिरिथति एवं जागरूकता के अभाव मे बाल श्रम की समस्या समुदायों मे बराबर बनी हुई है। जिससे बच्चों के अधिकारों का हनन के साथ सबसे विपरित प्रभाव उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास पर पड़ता है ।
स्वतंत्रता पश्चात विभिन्न सरकारों ने अपने समयकाल के दौरान अनेक नियम-अधिनियम एवं प्रावधानों का निर्माण किया तथा बच्चों के विकास हेतु योजना एवं कार्यक्रम भी चलाये है। परन्तु इन विषेष सुविधाओं के कारण भी ऐसे कौन से कारक है जिससे समाज मे इन गैर सामाजिक क्रिया-कलापों का अन्त नही हो रहा है। और इस गैर-सामाजिक क्रियालाप के समाधन मे जनजागरुकता की क्या भुमिका हो सकती है। इसी का अध्ययन इस षोध-पत्र मे किया गया है।
शोध अध्ययन का उद्देष्य -
ऽ अम्बिकापुर क्षेत्र के बाल श्रमिको की समस्याओं का अध्ययन करना एवं उन समस्याओं के प्रति लोगों में जागरूकता का क्या स्तर है। इसका विष्लेषण करना।
ऽ बाल श्रमिक को उनकी समस्या से मुक्त कराने मे जन जागरूकता एवं सामुदायिक सहभागिता कितना प्रभावी हो सकता है, इसका अध्ययन करना।
शोध अध्ययन क्षेत्र-
अम्बिकापुर सरगुजा जिले का केन्द्र स्थल है, सरगुजा जो छतीसगढ राज्य के उत्तर पूर्व दिशा में स्थित है जो राजधानी रायपुर से लगभग 341 कि.मी. दूरी पर स्थित है। जिले के पश्चिम मे बलरामपुर पूर्व में कोरबा, दक्षिण में सूरजपुर जिला स्थित है सरगुजा जिला में 7 तहसील एवं विकास खण्ड है जिनमें अम्बिकापुर, लखनपुर, उदयपुर, लुण्ड्रा, बतौली, सीतापुर, मैनपाट है जिले मे कुल 579 ग्राम है तथा जिले का भौगोलिक क्षेत्रफल 3757.04 वर्ग कि.मी. है सरगुजा जिले में जनगणना 2011 के अनुसार कुल जनसंख्या 23,59.886 है।
प्रस्तुत शोध अध्ययन सरगुजा जिले के अम्बिकापुर के विकासखण्ड के निवासियों के साथ किया गया है जिससे भारत की जनगणना 2011 के अनुसार बालको की संख्या 380445 है।
बाल श्रम-एक परिचय
सामान्यता श्रम का वह स्वरुप जिसे 5 से 14 वर्ष के आयु वर्ग के बालक बालिकाओ से आर्थिक उपार्जन के उदेश्य से कराया जाता है बाल श्रम कहलाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार 18 वर्ष से कम आयु का बालक श्रम करता है तो बाल श्रमिक कहलायेगा, जब कि अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन ने यह उम्र सीमा को 15 वर्ष माना है। अनेक देशो मेें इसकी अलग-अलग आयु सीमा को निर्धारित किया है। भारत वर्ष मे 14 वर्ष से नीचे के आयु के सभी बालकों से यदि श्रम करवाते है तो बाल श्रम माना जाता है जबकि 14 से 18 वर्ष तक के आयु वर्ग में कार्य के दशाओं के आधार पर बाल श्रमिकों की निर्धारित किया गया है। अर्थात बाल श्रम (निवारण एवं नियंत्रण)-1986 का अधिनियम 14 वर्ष से ऊपर के बालको के लिए कुछ खतरनाक कार्यो में नियोजन करने से रोकता है अगर अधिनियम द्वारा प्रतिबन्धित कार्यो मे उन्हे नियोजित किया जाता है तो वह बाल श्रम के अन्तर्गत आता है ।
स्वतंत्रता पश्चात भारत सरकार ने अनेक नियमों-विनियमो का निर्माण किया है, जो बालको को श्रम क्रियाकलापों में नियोजित करने पर प्रतिबंन्ध लगता है परन्तु समाज में निम्न आर्थिक सामाजिक परिस्थितियों, अशिक्षा-अज्ञानता तथा जागरुकता की कमी के कारण बालक को कार्यो में नियोजित किया जाता रहा है। जिसका प्रभाव ऐसे बालको के साथ उसके परिवार, समाज एवं राष्ट्र पर व्यापक रूप से पड़ता है। ऐसे विकट समस्याओं के मूल कारणो में सर्वप्रमुख अशिक्षा एवं जागरूकता का अभाव है क्योकि बालको के अविकसित अवस्था व समझ के कारण लोग उन्हे हानिकार एवं गैरहानिकारक कार्यो में नियोजित कर देते है। और उनका शारीरिक-मानसिक शोषण के साथ उसके विकास की प्रक्रिया को भी अवरूद्ध कर देते है। वर्तमान में बाल श्रम का सबसे विकट स्वरूप बाल तस्करी अंग तस्करी, बाल वैश्यावृत्ति भिक्षावृत्ति बाल अपराध का बढता स्तर है, जो धन लोलुपता या स्वार्थवश कराया जाता है और प्रायः ऐसी समस्याओं का जड़ से उन्मुलन मात्र सरकारी अधिनियमों से नही होगा, ऐसी समस्या के प्रति सामान्य लोगों मे भी पर्याप्त समझ एवं सजगता होना आवश्यक है। उपरोक्त विवरण के अनुरूप बाल श्रम का तात्पर्य किसी ऐसे रोजगार या बिना पैसे के कार्य कराने से है, जो बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन करते है, और जिस पर पुर्ण प्रतिबन्ध होना चाहिए।
मुलतः बाल मजदूरी केे दो प्रमुख प्रकार होते है जिनमें प्रथम निर्धारित आयु से कम आयु में रोजगार और द्वितीय हानिकारक दशाओ में रोजगार, विश्व के साथ उपरोक्त दोनो प्रकार भारत मे भी अत्यन्त प्रचलित है। अम्बिकापुर ये भी दोनो प्रकार के बाल श्रम प्रचलित है।
शोध अध्ययन पद्धति-
अध्ययन का समग्रः सरगुजा जिले के अम्बिकापुर विकास खण्ड को अध्ययन क्षेत्र के समग्र रूप में लिया गया है ।
अध्ययन की इकाई-
चयनित अध्ययन क्षेत्र अम्बिकापुर के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्र के निवासियों को अध्ययन की इकाई के रूप में लिया गया है।
निदर्षन विधि -
अम्बिकापुर के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रो में अध्ययन के लिए दैव निर्दशन विधि का प्रयोग किया गया है। जिसमें शिक्षित एवं व्यवसायिक गतिविधियों में संलग्न लोगों को चयनित किया गया है जिसमें से दोनो क्षेत्रो में 50-50 साक्षात्कार अनुसूची भरी गई है।
संमको का संकलन
प्राथमिक समंक -
प्राथामिक समंको का संकलन साक्षात्कार अनुसूची, अवलोकन एवं लोगो से परिचर्चा के माध्यम से समंको को एकत्रित किया गया है।
द्वितीयक संमक -
द्वितीयक समंक का संकलन, पुस्तक, पत्र-पत्रिका, सरकारी एवं गैर सरकारी रिर्पोट, ऑनलाइन वेवसाइट, इंटरनेट इत्यादि के द्वारा किया गया है।
विष्लेषण एवं परिणाम -
बाल श्रामिको के चुनौतियों के निवारण में मूलभूत आवश्यकता में बालकों के अधिकार एवं पोषण तथा स्वास्थ्य पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों के प्रति जागरूकता तथा समाज के लोगो में इस सामाजिक बुराई के प्रति जन सहभागी होना अत्यन्त आवश्यक है। और ही ऐसे बालको के शिक्षा स्वास्थ्य केे साथ उनका आर्थिक सुुदृढीकरण भी मूलभूत चुनौतियों मेे से एक है तथा बाल श्रमिको के प्रति लोगों मे भावनात्मक जागरूकता एवं जुडाव एक अत्यन्त महत्वपूर्ण आवश्यकता है ऐसे बालकों के सामाजिक एवं पारिवारिक विकास की स्थिति को निर्धारित करने हेतु आर्थिक समायोजन अत्यन्त महत्वपूर्ण कारक है तथा सरकारों को भी वैधानिक नीति नियोजन के साथ पारिवारिक आर्थिक सहयोग एवं सुरक्षा से इनकी क्षमता में वृद्धि करना चाहिए। जिससे बालको को अनैतिक श्रम की हानिकारक परिस्थिति से निकाल कर समाज का एक स्वास्थ्य नागरिक बनाया जा सकें।
तालिका 1 -ः क्या आप बाल अधिकारों के बारे में जानते है \
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तलिका क्रमाक - 1 के अनुसार अम्बिकापुर के शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रो में बाल अधिकारों के बारे मे जागरूकता के सम्बन्ध में प्राप्त तथ्यों से ज्ञात होता है कि कुल सर्वेक्षित लोगो मे से 29ः लोगो को बाल अधिकारी के बारे में जनकारी है जबकि 71ः लोग इन अधिकारो के प्रति अज्ञात है।
तलिका क्र. - 2 क्या आपने कभी ऐसे बालक को देखा है जो बालश्रम कर रहा हS\
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तालिका क्रमाक-2 के सर्वेक्षण, क्या आपने कभी ऐसे बालक को देखा है जो बाल श्रम कर रहा है के प्राप्त तथ्यों ये 83ः लोगों ने हॉ कहा जबकि 17ः लोगो ने बाल श्रमिको को नही देखा है। तालिका क्रमाक-2 (क) क्या आपने कभी ऐसे बालको को देखा है जो बाल श्रम कर रहा है। के पूरक प्रश्न मे अगर हॉ है तो आपने क्या किया से 71ः लोगो ने उत्तर बताया कि उन्होने कोई कार्यवाही नही किया या उन्हे कार्यवाही के सम्बन्ध में कोई जानकारी नही थी ।
तालिका क्रमाक - 3 बाल श्रम के हानिकारक दुष्प्रभावों के बारे मे जानते है ।
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तालिका क्र. 3 के अध्ययन से प्राप्त तथ्यों के अनुसार लगभग 82ः लोग बाल श्रम के हानिकारक दुष्प्रभावों के सम्बन्ध मे अज्ञान है मात्र 18ः लोगो को ही ऐसे दुष्प्रभावों के बारे मे जानकारी है।
तालिका क्रमाक - 4 क्या आपको बाल श्रम कानुनी प्रावधानों की जानकारी है -
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तालिका क्रमाक -4 के अध्ययन से प्राप्त तथ्यों मेें 14ः लोगो ने बताया कि उन्हे बाल श्रम के कानूनी प्रावधानो की जानकारी है 17ः लोगों के बताया की उन्हे अशंतः ऐसे मामलों के प्रति जागरूकता है जबकि 69ः लोगो ने इस अध्ययन मे नही का उत्तर दिया है।
तालिका क्रमाक - 5 क्या आप किसी गैर सरकारी संगठन या ऐसे लोगो को जानते है जो बाल श्रम को रोकने हेतु कार्य करते है।
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तलिका क्रमाक -5 क्या आप किसी गैर सरकारी संगठन या ऐसे लोगो को जानते है जो बाल श्रम को रोकने हेतु कार्य करते है के अध्ययन से प्राप्त तथ्य मे मात्र 12ः लोग ही हॉ मे उत्तर दिये जबकि 88ः लोगो को इसके बारे मे कोई जानकारी नही है।
निष्कर्ष-
बाल श्रामिकों की समस्या समाज एवं राष्ट्र के गम्भीर, ज्वलंत समस्याओं मेे से एक है। जो हमारे समाज एवं व्यवस्था की संवेदनहीनता एवं नकारात्मक शोषणवादी मानसिकता को मुर्त रूप में प्रर्दशित करता है। सामान्यता बाल श्रम के दुष्प्रभावों के प्रति अज्ञानता एवं आर्थिक स्वार्थ परकता से वाशिभूत हो कर लोग सस्ते श्रामिकों के रूप में बालकों को श्रामिक कार्यो में नियोजित कर देते है तथा ऐसे सेवा नियोजक द्वारा बालको का विभिन्न प्रकार से शोषण किया जाता है तथा कम मजदुरी के साथ वयस्कों को समान कार्य या कार्य परिस्थिति, शारीरिक हिंसा एवं शोषण मानसिक प्रताड़ना जैसे अनेक हनिकारक कार्य उनके साथ किया जाता है। जिससे बालको का समग्र विकास अवरूद्ध हो जाता है साथ ही उनके षारीरिक मानसिक एवं व्यक्तित्व विकास पर भी अत्यन्य गम्भीर प्रभाव पड़ता है।
प्रस्तुत अध्ययन अम्बिकापुर के शहरी ग्रामीण क्षेत्र के लोगो के मध्य बाल श्रामिको के चुनौतियों के प्रति जागरूकता का विश्लेषण तालिका द्वारा प्रस्तुत किया गया है। जिसमें लोगो के मध्य बाल अधिकारों के प्रति जागरूकता मात्र 29ः रही है 83ः लोगो ने बताया कि उन्होने बाल श्रामिको को विभिन्न कार्य दषाओं में कार्य करते देखा है तथा पूरक प्रश्न मेें ऐसे श्रामिको के प्रति उन्होने कोई कार्यवाही नही करने का उल्लेख किया है। बाल श्रम के हानिकारक दुष्प्रभावो के सम्बन्ध मे जागरूकता के बारे में 82ः लोगो ने नही बताया, तथा बाल श्रम के कानूनी प्रावधानों के बारे मे मात्र 14ः लोगों को ही जानकारी थी थोडा बहुत एवं जानकारी ना होने का प्रतिशत क्रमशः 17ः एवं 69ः था। हमने अपने अध्ययन में किसी ऐसे गैर सरकारी संगठन जो बाल श्रम को रोकने हेतु कार्यरत है तो इसके सम्बन्ध मेें जिसके प्रति जागरूकता मात्र 12ः लोगो तक ही सीमित रहा है साथ ही हमने अन्य प्रश्नों के माध्यमों से भी ऐसे बाल श्रमिको के समस्या एवं कठिनाईयों के प्रति जागरूकता का अध्ययन करना चाहा, जिससे भी अनेक स्तरो पर जागरूकता का अभाव पाया गया है।
बाल श्रामिको के चुनौतियों केे प्रति जागरूकता हेतु सुझाव
प्रस्तुत शोध पत अम्बिकापुर के क्षेत्र में बाल श्रामिकों के चुनैतियों के प्रति जागरूकता के सम्बन्ध में अध्ययन किया गया है। शोध अध्ययन उपरांत ज्ञात हुआ की अम्बिकापुर मे बाल श्रामिको के चुनौतियो के प्रति जागरूकता का अभाव है। जिसको दूर करने हेतु उपयुक्त सुझाव प्रस्तुत किया गया है।
(1) सामान्यता बाल श्रम के कारणों के विश्लेषण में आर्थिक कारको को ही उत्तरदायी माना जाता है। परन्तु यह पूर्णतः सत्य नही है ,बाल श्रम या बालको को उत्पादन की विपरित दशाओ के कार्यो मे नियोजन के अनेक कारण है जिनमें जागरूकता की कमी, दुष्प्रभावों की अज्ञानता, स्वार्थपरकता, सामाजिक कारको का प्रभाव व अशिक्षा जैसे भी अनेक कारक है जो बाल श्रम को प्रसारित करते है। जिसके लिए आवश्यक है कि लोगो के मध्य संचार के विभिन्न माध्यमों से व्यापाक प्रचार-प्रसार एवं जनसर्म्पक किया जाये, ताकि बाल श्रम से होने वाले हानिकारक दुष्प्रभावों के बारे में जागरूकता उत्पन्न किया जा सके।
(2) समाज मे ऐसे मामलों जहॉ बालको के साथ गलत व्यवहार किया जा रहा हो उसके प्रति सक्रिय प्रतिरोध आवश्यक है जिसके लिए लोगो के मध्य सजकता व सहभागिता के साथ आपसी मेलजोल दृढ़ इच्छाशक्ति को पर्याप्त स्तर तक बढाना आवश्यक है।
(3) वैधानिक नीति नियमों एवं अधिनियमों के निर्माण के साथ उसके उचित पालन तथा क्रियान्वयन व विनियमन के दिशा में कार्य करना चाहिए तथा सरकारों को विभिन्न स्तरों पर एक सक्रिय प्रति-क्रिया तंत्र स्थापित करना चाहिए। तथा बाल श्रामिको के समस्या निराकरण के लिए उतरदायित्वों का निर्धारण और उसका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए।
(4) ऐसी समस्याओं के निराकरण की क्रियाविधि के केन्द्र मे जन सहभागिता ,जागरूकता एवं सामाजिक इच्छाशक्ति को रखना चाहिए। तथा इनमे प्रभावशिलता के निर्माण हेतु व्यापक स्तर पर संचार, जन सम्पर्क तकनीको को उपयोग किया जाना चाहिए।
(5) बाल श्रम के त्वरित निराकरण हेतु सक्रिय सहायता केन्द्रो, एकीकृत हेल्पनलाइन नं. तथा पुर्नवास सुविधाओं का निर्माण किया जाना चाहिए।
(6) बाल श्रम एवं बाल श्रामिकों के समस्याओं पर समुदाय आधारित जागरूकता कार्यक्रमों का निर्माण किया जाना चाहिए एवं ऐसी समस्याओं पर एक आम सहमति का निर्माण किया जाना चाहिए।
(7) आर्थिक सुदृढीकरण, क्षमता निर्माण का व्यापक प्रसार इत्यादि जैसे उपायों को इन कार्यक्रमों समन्वित किया जाना चाहिए।
(8) बाल श्रम की समस्या निवारण हेतु विभिन्न क्षेत्रो मे कार्यरत गैर सरकारी संगठनो व व्यक्तियों को समान स्तर पर लाकर एक समन्वित समुदाय आधारित सहभागिता का कार्यक्रम संचालित करना चाहिए जिसमें सरकारी संस्थाओं का भी बराबर भागीदारी एवं सहयोग हो ताकि बाल श्रम के निवारण हेतु जन-आन्दोलन निर्मित हो, सामाजिक व नैतिक मुल्यों मे भी इसकी आलोचना हो।
सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
1. दशोरा, मनोज कुमार - ‘‘बाल श्रमिक समस्या एवं समाधान‘‘- हिमांशु पब्लिकेशन उदयपुर 2006
2. कुमार, डॉ विनोद - “अनुसूचित जाति के बालश्रमिक’’ कला प्रकाशन-वाराणसी 2008
3. शर्मा, सुभाष - भारत मे ंबाल मजदूरी प्रकाशन संस्थान - नई दिल्ली 2007
4. अग्रवाल, उमेश चन्द - “बालश्रम - चुनौतियोें एवं समाधान कुरूक्षेत्र, मई 2004, गा्रमीण विकास मंत्रालय नई दिल्ली
5. अग्रवाल, उमेश - “बालश्रम की विभिषिका‘‘ कुरूक्षेत्र 1 नवम्बर 2006 ग्रामीण विकास मंत्रालय-नई दिल्ली ।
6. बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय - 1989
7. बाल श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम - 1986
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Received on 26.05.2022 Modified on 19.06.2022 Accepted on 17.07.2022 © A&V Publication all right reserved Int. J. Ad. Social Sciences. 2022; 10(3):118-124.
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